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    होली पर विशेष-भूलते जा रहे लोग होली का मतलब

    बक्सर अप टू डेट न्यूज़ :-होली एक अवसर है।प्रेम के रंगों का कलरव है। होली के त्यौहार के बहाने से  इन्द्रधनुषी रंगों से सराबोर होकर मस्ती मे अपने सारे दुखों और कष्टों को भूला कर आह्लादित हो जाते हैं।
    खुले मन से सभी लोगों का स्वागत करते हुए, ईर्ष्या और द्वेष के भावों को एक किनारे रखकर उनसे गले मिलते हैं।
    सामाजिक त्योहार होली हमें भाईचारे का संदेश देता है जिसे हम भूलते जा रहे हैं और अपनी-अपनी दुनिया में खोए रहना अधिक पसंद करते हैं। यह मिलजुल कर रहने की सीख देता है। हम एक-दूसरे को गुलाल लगाकर गले मिलते हैं। यह परंपरा मनोमालिन्य को दूर करती है व सबको मिलाने का कार्य करती है।
    होलिका दहन करते समय अपने मन में उठने वाले कुविचारों और वैमनस्य की आहुति दे देनी चाहिए। इससे मन के विकार दूर होते हैं और मनुष्य को शान्ति मिलती है। दूसरों के प्रति जाने-अनजाने किए गए अपराधों के लिए की गई क्षमा याचना किसी महान कार्य की सफलता से कमतर नहीं होती। इस प्रयास की पहल मनुष्य को दूसरों से अलग करते हुए एक नई पहचान देती है।
    होली का नाम लेते ही मस्तिष्क में रंग-रंगीले रंगों का चित्र उभर आता है। इस उत्सव के विषय में आँखों के समक्ष मानो एक रील-सी चलने लगती है। सदियों से ही यह त्यौहार वसन्त ऋतु में मनाया जाता है। फाल्गुण के महीने में इस त्यौहार को मनाने के पीछे एक कारण है। इस समय प्राकृतिक शोभा निहारते ही बनती है। वसन्त ऋतु में विविध प्रकार के खिले हुए फूल चारों ओर अपनी सुगन्ध और छटा बिखेरते हैं। इस समय हवा में भी फूलों की सुगंध फैलती है और वह शीतल होती है। ठंड का प्रकोप भी कम होने लगता है। ऐसे खुशगवार मौसम में त्योहार मनाने की मस्ती छा जाती है। यदि फूलों के अर्क से होली खेली जाए तो हर व्यक्ति खुशबू से सराबोर हो जाएगा। प्राचीन काल में आज की तरह रासायनिक रंगो का प्रयोग बिल्कुल नहीं किया जाता था। हमारे ऋषि-मुनि स्वयं कभी हानिकारक पदार्थों का उपयोग नहीं करते थे। इसलिए वे दूसरों को भी इनसे बचने का परामर्श देते थे। उस समय केवल फूलों से ही होली खेलने की प्रथा थी। सुगन्धित फूलों के जल को पिचकारियों से एक-दूसरे के ऊपर डालकर लोग आनन्दित होते थे। इससे चारों ओर का वातावरण भी महकने लगता था। बच्चे, बूढ़े और स्त्रियाँ सभी लोग इस रंगोत्सव को मनाकर प्रसन्न होते हँ।
    वास्तव में यह एकता का त्यौहार है। छोटे-बड़े आदि के भेदभाव को भूलकर सब लोग एक-दूसरे के गले मिलते हैं। घरों में अनेक प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं जिन्हें खाकर सभी लोग उत्साहित होते हैं तथा मित्रों-संबंधियों को दावत भी देते हैं।

              शहरों में यह त्योहार अब केवल रंग खेलने तक ही सीमित रह गया है परन्तु ग्रामीण इलाकों में आज भी उसी उल्लास से इस त्योहार को मनाया जाता है।
    बड़े इस त्यौहार का आनन्द लेते ही हैं, बच्चे भी कुछ कम हुड़दंग नहीं मचाते। उन्हें भी दूसरों पर रंग डालना, गुब्बारों में रंगीन पानी भरकर मारना बहुत अच्छा लगता है। अपने साथियों को ढेर सारा रंग लगाकर और पानी से गीला करके इस त्यौहार को मनाते हैं। इसलिए बच्चे विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी पिचकारियों व रंग या पानी भरे गुब्बारे फैंककर खुशी प्रकट करते हैं। थोड़ी-थोड़ी देर में लोगों की गाती-बजाती निकलने वाली टोलियाँ त्यौहार की रौनक में चार चाँद लगाती हैं।
    आजकल प्राय: होली मिलन उत्सव मनाया जाता है। अपने-अपने क्षेत्र के लोग मिलकर होली खेलते हैं और फिर भोजन भी खाते हैं। कई बिरादरियों के लोग इस दिन सहभोज या प्रीतिभोज रखते हैं। होलिका दहन के अगले दिन ही रंग खेला जाता है। इसलिए इस दिन सभी बाजार, दफ्तर, स्कूल, कालेज आदि बन्द रहते हैं। सरकारी वाहन भी दोपहर दो बजे के बाद चलते हैं। इसी कारण चारों ओर मस्ती का माहौल बना रहता है।
      जोर-जोर से बजने वाले ढोल-डमाके इस त्योहार की रौनक में चार चाँद लगाते हैं।
    बरसाने की लट्ठमार होली भारत में ही नहीं अपितु पूरे विश्व में भी प्रसिद्ध है।त्यौहार की पवित्रता बनाए रखना हम सभी का कर्त्तव्य है। नशा करके अनावश्यक हुड़दंग करना अथवा छेड़छाड़ करना उचित नहीं। इन बुराइयों से बचना चाहिए तभी त्यौहार का वास्तविक आनन्द आता है।
    होली के इस पावन त्योहार पर अपने अंतस में विराजमान ईर्ष्या, द्वेष आदि बुराइयों को दहन करना चाहिए। इन बुराइयों को यदि हम दूर कर सकें तभी इस त्योहार की सार्थकता है। अपने अंतस की दुर्भावनाओं का होलिका में दहन करके स्वच्छ, पवित्र तथा खुले मन से सबको गले लगाकर त्यौहार की गरिमा को बनाए रखना सभी सुधी जनों का दायित्व है।

    सभी को होली के पावन पर्व की शुभकामनाएँ।
    स्रोत-नवयुग संदेश
    https://drive.google.com/file/d/1R8rvtPijg0C4duKxbK6hUoCoqtU3ZuQ5/view