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    अंतराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष: बाधाओं को बौना साबित कर रही हैं महिलाएं- दिलमणी देवी

    बक्सर अप टू डेट न्यूज़ :-भारतीय संस्कृति में नारी के सम्मान को बहुत महत्व दिया गया है. संस्कृत में एक श्लोक है- 'यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता:. अर्थात्, जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं. किंतु वर्तमान में जो हालात दिखाई देते हैं, उसमें नारी का हर जगह अपमान होता चला जा रहा है. उसे 'भोग की वस्तु' समझकर आदमी 'अपने तरीके' से 'इस्तेमाल' कर रहा है. यह बेहद चिंताजनक बात है. लेकिन हमारी संस्कृति को बनाए रखते हुए नारी का सम्मान कैसे किय जाए, इस पर विचार करना आवश्यक है.

    माता का हमेशा सम्मान हो

    मां अर्थात माता के रूप में नारी, धरती पर अपने सबसे पवित्रतम रूप में है। माता यानी जननी. मां को ईश्वर से भी बढ़कर माना गया है, क्योंकि ईश्वर की जन्मदात्री भी नारी ही रही है. किंतु बदलते समय के हिसाब से संतानों ने अपनी मां को महत्व देना कम कर दिया है. यह चिंताजनक पहलू है। सब धन-लिप्सा व अपने स्वार्थ में डूबते जा रहे हैं. परंतु जन्म देने वाली माता के रूप में नारी का सम्मान अनिवार्य रूप से होना चाहिए, जो वर्तमान में कम हो गया है, यह सवाल आजकल यक्षप्रश्न की तरह चहुंओर पांव पसारता जा रहा है. इस बारे में नई पीढ़ी को आत्मावलोकन करना चाहिए.

    बाजी मार रही हैं लड़कियां

    अगर आजकल की लड़कियों पर नजर डालें तो हम पाते हैं कि ये लड़कियां आजकल बहुत बाजी मार रही हैं. इन्हें हर क्षेत्र में हम आगे बढ़ते हुए देखा जा सकता है. विभिन्न परीक्षाओं की मेरिट लिस्ट में लड़कियां तेजी से आगे बढ़ रही हैं. किसी समय इन्हें कमजोर समझा जाता था, किंतु इन्होंने अपनी मेहनत और मेधा शक्ति के बल पर हर क्षेत्र में प्रवीणता अर्जित कर ली है. इनकी इस प्रतिभा का सम्मान किया जाना चाहिए.

    कंधे से कंधा मिलाकर चलती नारी

    नारी का सारा जीवन पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने में ही बीत जाता है. पहले पिता की छत्रछाया में उसका बचपन बीतता है. पिता के घर में भी उसे घर का कामकाज करना होता है तथा साथ ही अपनी पढ़ाई भी जारी रखनी होती है. उसका यह क्रम विवाह तक जारी रहता है.

    उसे इस दौरान घर के कामकाज के साथ पढ़ाई-लिखाई की दोहरी जिम्मेदारी निभानी होती है, जबकि इस दौरान लड़कों को पढ़ाई-लिखाई के अलावा और कोई काम नहीं रहता है. कुछ नवुयवक तो ठीक से पढ़ाई भी नहीं करते हैं, जबकि उन्हें इसके अलावा और कोई काम ही नहीं रहता है. इस नजरिए से देखा जाए, तो नारी सदैव पुरुष के साथ कंधेसे कंधा मिलाकर तो चलती ही है, बल्कि उनसे भी अधि‍क जिम्मेदारियों का निर्वहन भी करती हैं. नारी इस तरह से भी सम्माननीय है.

    अभद्रता की पराकाष्ठा

    आजकल महिलाओं के साथ अभद्रता की पराकाष्ठा हो रही है. हम रोज ही अखबारों और न्यूज चैनलों में पढ़ते व देखते हैं, कि महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की गई या सामूहिक बलात्कार किया गया. इसे नैतिक पतन ही कहा जाएगा. शायद ही कोई दिन जाता हो, जब महिलाओं के साथ की गई अभद्रता पर समाचार न हो.

    क्या कारण है इसका?

    प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में दिन-पर-‍दिन अश्लीलता बढ़ती‍ जा रही है. इसका नवयुवकों के मन-मस्तिष्क पर बहुत ही खराब असर पड़ता है. वे इसके क्रियान्वयन पर विचार करने लगते हैं. परिणाम होता है दिल्ली गैंगरेप जैसा जघन्य व घृणित अपराध. नारी के सम्मान और उसकी अस्मिता की रक्षा के लिए इस पर विचार करना बेहद जरूरी है, साथ ही उसके सम्मान और अस्मिता की रक्षा करना भी जरूरी है.

    अंत में...

    अंत में हम यही कहना ठीक रहेगा कि हम हर महिला का सम्मान करें. अवहेलना, भ्रूण हत्या और नारी की अहमियत न समझने के परिणाम स्वरूप महिलाओं की संख्या, पुरुषों के मुकाबले आधी भी नहीं बची है. इंसान को यह नहीं भूलना चाहिए, कि नारी द्वारा जन्म दिए जाने पर ही वह दुनिया में अस्तित्व बना पाया है और यहां तक पहुंचा है. उसे ठुकराना या अपमान करना सही नहीं है. भारतीय संस्कृति में महिलाओं को देवी, दुर्गा व लक्ष्मी आदि का यथोचित सम्मान दिया गया है अत: उसे उचित सम्मान दिया ही जाना चाहिए.

    दिलमणी देवी, अध्यक्ष
    बिहार राज्य महिला आयोग
    बिहार सरकार
    https://drive.google.com/file/d/1R8rvtPijg0C4duKxbK6hUoCoqtU3ZuQ5/view